रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773

रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773

प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आप को विस्तारित करने का प्रयास किया और इस विस्तार के क्रम में उसके सारे क्रियाकलाप अनियंत्रित हो गए।  इस समय ईस्ट इंडिया कंपनी के क्रियाकलाप को नियंत्रित करने की जरूरत महसूस हुई।

ब्रिटेन में रहने वाले व्यापारी भी ईस्ट इंडिया कंपनी से ईर्ष्या करते थे क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत तथा अन्य एशियाई देशों से व्यापार करने का एकाधिकार पत्र मिला हुआ था इसलिए वे व्यापारी भारत से होने वाले  व्यापारिक लाभों में हिस्सेदारी नहीं कर पा रहे थे। इस लाभ में हिस्सेदारी पाने के लिए उन्होंने भी  ब्रिटेन की संसद के सदस्यों के कान भरने शुरू किए।

ब्रिटिश संसद ने सेलेक्ट कमेटी व सीक्रेट कमेटी के माध्यम से पता किया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के हालत ठीक नहीं चल रही है उसके अधिकारी भ्रष्ट है और वे अपने व्यापार में लगे हुए हैं और इसके चलते ईस्ट इंडिया कंपनी एक घाटे की कंपनी बन के रह गई है। इसलिए सांसदों नें एक्ट के माध्यम से कंपनी को नियंत्रित करने की कोशिश की और ऐसा पहला एक्ट 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट था।

यह एक्ट भारत के संवैधानिक विकास में एक मील का पत्थर है क्योंकि पहली बार ब्रिटिश संसद में कंपनी के कार्यों को लेकर एक कानूनी प्रक्रिया शुरू की थी जो प्रक्रिया बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा 1858 में भारत का प्रशासन अपने हाथ में लेने पर एक और कड़े संवैधानिक ढांचे में बदल गई। 

इस अध्याय में हम देखेंगे रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के लागू होने के समय ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन किस प्रकार से चल रहा था और इसे नियंत्रित करने के लिए रेगुलेटिंग एक्ट की जरूरत क्यों पड़ी? ऐसे एक्ट को लाने के उद्देश्य क्या थे और इसके मुख्य प्रावधान क्या थे?

 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट द्वारा गवर्नर जनरल का ऑफिस बनाया गया और बंगाल की प्रेसिडेंसी को प्रमुखता दी गई।

कोलकाता में सुप्रीम कोर्ट को बनाने का भी प्रावधान था और कंपनी पर ज्यादा नियंत्रण करने का भी प्रावधान था।

रेग्यूलेटिंग एक्ट का क्या महत्व था और इसमें क्या दोष है जो बाद में दूर किए गए।

ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन एक कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा किया गया जिसके लिए 24 निदेशकों की नियुक्ति की गई थी। यह कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स कंपनी के शेयरधारकों द्वारा वार्षिक रूप से चुनकर आते थे। इन शेयरधारकों के समूह को कोर्ट ऑफ प्रोपराइटर्स कहा जाता था। मतलब यह है कि कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का चुनाव कोर्ट ऑफ प्रोपराइटर्स करती थी।  कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स निदेशक मंडल कहलाता था और कोर्ट ऑफ प्रोपराइटर्स शेयरधारकों को कहा जाता था।

ईस्ट इंडिया कंपनी के हर दिन के कामकाज को कोर्ट ऑफ डायरेक्टर की कई कमेटियों के द्वारा किया जाता था।

 कंपनी ने मुंबई मद्रास और कोलकाता में तीन प्रेसिडेंसिओं का गठन किया और इन तीनों के सदस्यों में एक-एक गवर्नर की नियुक्ति की, जिसकी सहायता के लिए एक काउंसिल का भी गठन किया गया। सपरिषद गवर्नर को गवर्नर इन काउंसिल कहा जाता था।

यह तीनों प्रेसिडेंसी एक दूसरे से स्वतंत्र थी और अपने आप में, अपनी सीमा तक, संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न थी और इंग्लैंड में रहने वाले कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के प्रति जवाबदेह थीं।

 रेग्यूलेटिंग एक्ट लगाने की परिस्थितियां

प्लासी और बक्सर के युद्ध में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्राधिकार को स्थापित कर दिया था।

समय में ईस्ट इंडिया कंपनी का क्षेत्र आजकल के महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश तक फैल गया था।

बक्सर के युद्ध के बाद अवध का नवाब अंग्रेजों का सहायक बन गया और मुगल बादशाह शाह आलम उनका पेंशनर बन गया। बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी पहले से ही मजबूत थी और वहां के नवाब को बनाने या हटाने में पूरी तरह सक्षम थी इसलिए बक्सर के युद्ध के बाद वहां राबर्ट क्लाइव द्वारा शासन की दोहरी व्यवस्था को स्थापित किया गया। जहां कंपनी ने राज्य के दीवानी अधिकारों को अपने हाथ में ले लिया और निजामत के अधिकार अपने कठपुतली नवाब को दे दिए। दोहरी व्यवस्था का पूरी तरह फायदा ईस्ट इंडिया कंपनी को हुआ क्योंकि उसे बिना जिम्मेदारी के राज्य के खजाने पर नियंत्रण मिल गया था। इस तरह कंपनी का अतिशय विस्तार हो गया था और कंपनी के अधिकारी मनमाना शासन चला रहे थे।  कंपनी के अधिकारियों ने घूस लेकर और अन्य फायदे लेकर एक भ्रष्टाचार का माहौल तैयार कर दिया था जिसके प्रति खुद अंग्रेज ही सशंकित थे।  वह ब्रिटिश साम्राज्य को ईस्ट इंडिया कंपनी की कारगुजारिओं के बारे में बताना चाहते थे और इसलिए प्रेस की स्थापना करने का प्रयास भी कर रहे थे जो बहुत बाद में 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की द्वारा बंगाल गजट के प्रकाशन से शुरू की जा सकी। बंगाल गजट में सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के भ्रष्टाचार का ही खुलासा किया गया था इससे पता चलता है कि कंपनी के  मुलाजिमों में एक तरह का  असंतोष पनप रहा था और वो कंपनी के अधिकारियों पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण चाहते थे।

ब्रिटेन में रहने वाले व्यापारी भी ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार से खुश नहीं थे और वह चाहते थे कि ब्रिटिश संसद किसी तरह से ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को खत्म करें और उन्हें नियंत्रित करने के लिए नए कदम उठाए।

इन सब नए घटनाक्रमों के बीच में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ब्रिटिश संसद से 10 लाख पाउंड का ऋण मांगा और ब्रिटिश संसद ने इस समय को सबसे अच्छा समझा कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी पर किसी तरह का नियंत्रण स्थापित दिया जाए क्योंकि ऋण देने के कारण वे ईस्ट इंडिया कंपनी को निर्देश देने की क्षमता रखते थे।

इन्हीं सब परिस्थितियों के चलते ब्रिटिश संसद ने 1773 में एक रेगुलेटिंग एक्ट पास किया जिसे रेगुलेटिंग एक्ट 1773 कहा जाता है।

रेग्यूलेटिंग एक्ट के उद्देश्य-

रेग्यूलेटिंग एक्ट 1773 के लागू करने के प्रमुख उद्देश्य थे –

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रबंधन की समस्या को सुलझाना

लॉर्ड क्लाइव द्वारा बनाई गई शासन की दोहरी व्यवस्था की समस्या को देखना

 ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जो कि एक व्यापारिक कंपनी से बढ़कर एक राजनीतिक सत्ता बन गई थी उसके क्रिया-कलापों को नियंत्रित करना आवश्यक था।

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मुख्य प्रावधान

फोर्ट विलियम प्रेसिडेंसी में गवर्नर जनरल के ऑफिस को स्थापित किया गया। बंबई और मद्रास की प्रेसिडेंसियों को कोलकाता की प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया गया।

 बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल कहा गया और उसे भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्रों का प्रशासन सम्हालना था।

गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल को 4 सदस्यों की एक कार्यकारी परिषद (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा सहायता प्राप्त होनी थी। वारेन हेस्टिंग्स बंगाल का पहला गवर्नर जनरल बना। कार्यकारी परिषद के सदस्य थे- लेफ्टिनेंट जनरल जॉन क्लेवरिंग, जॉर्ज मान्सन रिचर्ड बारवेल और फिलिप फ्रांसिस।

इन कार्यकारी सदस्यों को केवल कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आग्रह पर ब्रिटिश सम्राट या साम्राज्ञी द्वारा ही हटाया जा सकता था।  इसका अर्थ यह है कि गवर्नर जनरल को इन पर कोई प्रमुखता प्राप्त नहीं हुई। इस जगह पर एक बात का ध्यान रखना है कि गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल बाद में अपनी शक्ति को बढ़ाते हुए गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया बन गया और 1773 के बाद से गवर्नर जनरल की शक्तियों का बढ़ने का क्रम लगातार जारी रहा है जो कि अगले सारे एक्टों में आप देख पाएंगे।

रेग्यूलेटिंग एक्ट द्वारा गवर्नर जनरल को कार्यकारी परिषद के मुकाबले  कम अधिकार दिए गए थे जो बाद के अनेक एक्टों में बढ़ा दिए गए जिससे परिषद का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ और गवर्नर जनरल का प्रभाव बढ़ने लगा।

 1773 के द्वारा बंबई और मद्रास के गवर्नरों को आज्ञा दी गई कि वह गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल के दिए गए आदेशों का पालन करें।  गवर्नर जनरल को नियम, अध्यादेश और विनियम बनाने के अधिकार दिए गए। इन विनियमों और नियमों को सुप्रीम कोर्ट में पंजीकृत करना अनिवार्य था और इस पंजीकरण के 2 साल के अंदर सपरिषद सम्राट या साम्राज्ञी द्वारा इन्हें निरस्त भी किया जा सकता था।

मतदान की प्रक्रिया में बदलाव

 क्या इस  एक्ट द्वारा कोर्ट ऑप प्रोप्राइटर्स के सदस्यों की मत देने के अधिकार की धनराशि 500 पाउंड से बढ़ाकर 1000 पाउंड कर दी गई यानी जिस व्यक्ति का शेयर 1000 पाउंड से कम था उसे कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं दिया गया। रेग्यूलेटिंग एक्ट से पहले कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स का चुनाव हर साल होता था परंतु रेगुलेटिंग एक्ट के प्रावधान के अनुसार अब उनका चुनाव हर चौथे साल में होने लगा और उनमें से एक चौथाई व्यक्तियों को हर वर्ष नियुक्त किया जाने लगा। कोर्ट ऑफ डाइेक्टर्स के लिए अनिवार्य कर दिया गया कि वह सपरिषद गवर्नर जनरल द्वारा दिए गए पत्रों और सुझावों को संसद के समक्ष रखें।

कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट का गठन

रेगुलेटिंग एक्ट में फोर्ट विलियम में एक सुप्रीम कोर्ट बनाने का प्रावधान किया गया जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति होनी थी। सर एलिजा इम्पे इस कोर्ट का पहला मुख्य न्यायाधीश बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट को दीवानी, फौजदारी और सैन्य संबंधी मुकदमों को सुनने का अधिकार दिया गया और इसके आदेशों को नियम मानने का प्रावधान बनाया गया। इस कोर्ट को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सभी ब्रिटिश लोगों के लिए बनाया गया।  सुप्रीम कोर्ट को भारतीयों के धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं का सम्मान करने के लिए भी कहा गया। प्रांतीय न्यायालयों से सपरिषद गवर्नर जनरल के यहां अपील की जा सकती थी और इसके आगे सपरिषद सम्राट या साम्राज्ञी के यहां अपील की जा सकती थी।

कंपनी पर बढ़ा नियंत्रण

ईस्ट इंडिया कंपनी को इंग्लैंड के सम्राट या साम्राज्ञी के नियंत्रण में कर दिया गया और कंपनी के उच्च अधिकारियों, जजों और कंपनी निदेशकों के नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई।

कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को  ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व दीवानी और सैन्य मामलों की रिपोर्टों को पेश करने के आदेश दिए गए।

एक्ट में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा उपहार और रिश्वत लेने पर प्रतिबंध लगा दिए। इस एक्ट में गवर्नर जनरल बाकी प्रेसिडेंसियों के गवर्नर, मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के वेतनमान का भी प्रावधान किया गया।

एक्ट का महत्त्व

इस एक्ट में कंपनी के राजनीतिक कार्यों की पहचान की गई और पहली बार इस तरह की सरकार को ब्रिटिश संसद के अधीन किया गया।

ब्रिटिश सरकार का भारत के प्रशासनिक तंत्र को पूर्णता केंद्रीकृत करने का यह पहला प्रयास था जिसे बाद में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 के द्वारा पूरी तरह केंद्रीकृत कर दिया गया।

एक्ट में पहली बार ब्रिटिश भारत के लिए कंपनी के मनमाने नियमों के बजाय एक विधिवत लिखित विनियम बनाने का कार्य किया गया,जो कि बाद के प्रशासनिक ढांचे की आधारशिला बन गया।

इस एक्ट के द्वारा एक ऐसा तंत्र बनाया गया जिसमें गवर्नर जनरल एक तानाशाह की तरह कार्य न करें और उसे कार्यकारी परिषद के समकक्ष भी रखा गया। 

 इस एक्ट में बिना किसी विवाद के बंगाल की प्रेसिडेंसी को अन्य प्रेसिडेंसियों से उच्च स्थिति प्रदान की गई।

विदेश मामलों में मुंबई या मद्रास की प्रेसिडेंसी को बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन रखा गया और इन दोनों प्रेसिडेंसियों की जगह सपरिषद गवर्नर जनरल ही इस मामले में निर्णय लेता था।

कोई भी प्रेसिडेंसी भारतीय राजाओं से युद्ध नहीं लड़ सकती थी ना ही कोई संधि कर सकती थी। यह सारे कार्य गवर्नर जनरल को

सौंप दिए गए।

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के दोष

रेगुलेटिंग एक्ट एक अच्छी मंशा से बनाया गया पर इसके परिणाम गलत हुए। इसमें कई दोष बाकी रह गए थे।

सबसे पहले तो गवर्नर जनरल को उसकी परिषद के समक्ष अधिकारहीन कर दिया गया था क्योंकि गवर्नर जनरल को हर बात पर परिषद का सहयोग लेना ही होता था और परिषद के सदस्य चाहे तो गवर्नर जनरल के खिलाफ भी निर्णय दे सकते थे क्योंकि परिषद में 4 सदस्य थे और उनमें वह और गवर्नर मिला के 5 सदस्यों में 3 सदस्य भी एक तरफ हो जाएं तो गवर्नर जनरल के खिलाफ कोई निर्णय लिया जा सकता था। इस तरह से गवर्नर जनरल को बहुत ज्यादा शक्ति नहीं मिली हुई थी।

उसे सपरिषद लिए गए निर्णय को वीटो करने की शक्ति भी नहीं थी।

फोर्ट विलियम में बनाए गए सुप्रीम कोर्ट से संबंधित नियम भी आधे अधूरे और दोषपूर्ण थे।

रेगुलेटिंग एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के न्याय क्षेत्र को भी निर्धारित नहीं किया था। इसके अलावा रेगुलेटिंग एक्ट में गवर्नर और सुप्रीम कोर्ट के शक्तियों के बीच कोई पृथक्करण भी स्थापित नहीं किया था।

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 बंबई और मद्रास की प्रेसिडेंसियों ने आपातकालीन प्रावधानों के नाम पर अपने ही आदेशों को बनाए रखने की कोशिश की और बंगाल प्रेसिडेंसी से लिए गए आदेशों को ज्यादा महत्व नहीं दिया।

रेगुलेटिंग एक्ट द्वारा ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी पर नियंत्रण रखने की कोशिश तो की परंतु यह नियंत्रण कारगर साबित नहीं हुआ क्योंकि गवर्नर जनरल द्वारा भेजी गई रिपोर्ट का अध्ययन करने और उनकी पूरी छानबीन करने की कोई व्यवस्थित प्रणाली स्थापित नहीं की गई थी।

इस एक्ट में कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं था जो भारत की जनता के हितों के लिए लिया गया हो और भारत की जनता वैसे ही अभावों में जीती रही और ब्रिटिश शासकों के कुप्रशासन का शिकार रही। 

रेगुलेटिंग एक्ट 1773 के प्रावधानों की कमियों को दूर करना

1781 में लाए गए संशोधन अधिनियम द्वारा रेगुलेटिंग एक्ट 1773 की कई कमियों को दूर किया गया 1781 के संशोधन अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट की ताकतों को कम करके उसे गवर्नर जनरल से कम ताकतवर बनाया जिससे गवर्नर जनरल की शक्ति में वृद्धि हुई। 1784 पिट्स इंडिया एक्ट में गवर्नर जनरल को वीटो की शक्ति दी गई और बाकी प्रेसिडेंसियों गवर्नरों को गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल के अधीन कर दिया गया।

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